बड़े गोपालदास जी

आप पूर्वाश्रम में खांतडि़या पारीक थे तथा जोबनेर निवासी थे। आप गृहस्‍थाश्रम में रहे। आपके लड़के सुवालालजी थे। जब दादूजी महाराज जोबनेर पधारे तो आपने उनका यथोचित स्‍वागत सत्‍कार किया तथा सत्‍संग कराकर दादूजी की वाणी से जनता जनार्दन को ब्रह्म ज्ञान सुलभ कराया। बाद में आप नरायणा (नरेना) चले गए तथा दादूजी के शिष्‍य बन गये। आप दादूजी के 52 शिष्‍यों में से हैं। दादू मंदिर के निर्माण में आपका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है और अंत समय तक आप मंदिर के पुजारी रहे। 

आपके जीवन वृत्त को दादू पंथ परिचय के प्रथम भाग में निम्‍न प्रकार दिग्‍दर्शित किया गया है: "सांभर से आमेर जाते समय जब दादूजी अपने शिष्‍यों सहित जोबनेर में पधारे तब दादूजी का आगमन सुनकर वहां का गोपाल भक्‍त अति प्रसन्‍न हुआ और अपने साथियों के साथ दादूजी के सामने अगवानी करने आया और प्रणामादि शिष्‍टाचार के पश्‍चात अति आदर से ले जाकर अच्‍छे स्‍थान पर ठहराया। शिष्‍य मंडली सहित दादूजी की अच्‍छी सेवा की। सेवा से अवकाश प्राप्‍त होने पर श्रद्धा भक्ति सहित दादूजी को प्रणाम करके दादूजी के सामने उपदेश की इच्‍छा लेकर बैठ गया। दादूजी ने उसके मनोभाव को अपनी योगशक्ति से जान लिया और उसके अधिकार के अनुसार उपदेश देने के लिए यह पद बोला-"

सो तत्‍व सहजैं सुषुमन कहना,

सांच पकड़ मन जुग-जुग रहना। ।। टेक ।। 

प्रेम प्रीतिकर नीका राखे,

बारंबार सहज नर भाखे। ।। 1 ।। 

मुख हिरदय सो सहज संभारे,

तिहिं तत्‍व रहणा कदे न बिसारे। ।। 2 ।। 

अंतर सोई नीका जाणे,

निमेष न बिसरे ब्रह्म बखाणे। ।। 3 ।। 

सोई सुजाण सुधारस पीवे,

दादू देख जुगे जुग जीवे। ।। 4 ।।

"अर्थ- जिस तत्‍व के विषय में योगियों का कहना है कि सुषुम्‍ना नाड़ी के चलने पर शनै: शनै: साधन की प्रौढ़ावस्‍था में प्राप्‍त होता है। हे मन! तुझे उसी सत्‍य ब्रह्म तत्‍व को प्रतिक्षण पकड़े रहना चा‍हिए। योगी नर प्रीति पूर्वक बारंबार सहजावस्‍था में जाकर अपने हृदय में अच्‍छी प्रकार प्रेम से उसका ध्‍यान करता है और सहज स्‍वरूप का नाम मुख से उच्‍चारण करता है मन में स्‍मरण करता है, उस तत्‍व में वृत्ति रखना कभी भी नहीं भूलता।" "ज्ञान द्वारा संशय विपर्यय रहित अच्‍छी प्रकार बुद्धि में जानता है। एक निमेष मात्र भी उसे भूलता नहीं है। ब्रह्म का ही प्रवचन करता है। वही बुद्धिमान इस प्रकार स्‍मरण सुधा रस का पान करते हुए उस ब्रह्म तत्‍व का साक्षात्‍कार करके ब्रह्म रूप से प्रति युग में जीवित रहता है।"

"उक्‍त उपदेश श्रवण करके गोपाल भक्‍त दादूजी के शिष्‍य बन गये और बड़े गोपालदास के नाम से दादूजी के 52 शिष्‍यों में प्रसिद्ध हुए। गोपाल भक्‍त ने कुछ दिन घर पर रहकर भी भजन किया था किंतु फिर वे विरक्‍त होकर घर से निकल गये थे और दादूजी महाराजा नरायणा में आकर विराजे थे तब से दादूजी के पास ही रहते थे। दादूजी महाराज से ब्रह्मलीन होने पर जब दादू वाणी की प्रतिष्‍ठा हुई थी तब बड़े गोपालदास जी को ही पुजारी नियुक्‍त किया गया था। श्रीदादू वाणी मंदिर नरायणा के प्रथम पुजारी बड़े गोपालदास जी ही हुए थे। बड़े गोपालदास जी वाणी मंदिर में प्रतिदिन तप, दीप सुधारना, आरती करना आदि सभी पुजारी कार्य करते थे। सभी गुरु भाई आपको बड़े गोपालदास जी के नाम से पुकारा करते थे। राघवदास जी ने भक्‍तमाल में एक मनहर छन्‍द द्वारा बड़े गोपालदास जी का परिचय दिया है"- 

राघवदास जी कृत भक्‍तमाल में आपके संबंध में लिखा गया है कि आप दादूजी के पास रात दिन जिज्ञासू बनकर रहते थे तथा निरंतर प्रभु चिंतन करते रहते थे।

मनहर- दादू जी के पंथ में बड़ो गोपाल गोप्‍य रह्यो,

रुचि सेती राम कह्यो मांहि मन घेर के। 

पढ़ गुरु मंत्र जाप शत्रु सब काढ़े दूर,

आतमा लगाई परमातमा से प्रेरि के ।। 

हरि की सगाई हेत सर्व को संतोष देत,

कीन्‍हों परमारथ बतायो वित्त टेरि के। 

राघो कहै रात दिन हो रह्यो जिज्ञासु जन,

पूछ के परम गुरु लीन्‍हों हरि हेरि के।।


"दादू जी के पंथ में दादूजी के शिष्‍य बड़े गोपाल जी गुप्‍त ही रहे थे, अपने को प्रकट करने का काम वाणी, रचना आदि कुछ भी नहीं किया था। अपने मन को भीतर रोक कर प्रीति सहित राम का ही चिंतन किया था। गुरु मंत्र पढ़कर उसका जाप करते हुए अपने अंत:करण रूप स्‍थान से कामादि सर्व शत्रुओं को निकाल कर दूर भगा दिया था। अन्‍य प्राणियों को भी उपदेश देकर परमात्‍मा की भक्ति में लगाया था। हरि से संबंध कराने के लिए सबको संतोष देते थे अर्थात प्रभु प्राप्ति का आश्‍वासन देते थे। आपने परमार्थ का ही काम किया था और साधकों का उपदेश देकर परमात्‍मा रूप अपना परम धन बताया था। राघवदास जी कहते हैं- इतना होने पर भी आप अपने गुरु दादूजी के पास रात दिन जिज्ञासु बनकर ही रहते थे। परम गुरु दादूजी से परम रहस्‍य पूछ कर तथा गुरुजी के उत्तर वचनों को विचार करके हरि को प्राप्‍त कर लिया था। आप नरेना (जयपुर) में ही रहते थे। आप दादू द्वारा नरायणा (नरेना) में ही ब्रह्मलीन हुए थे।"

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